यह कौन होते हैं पूछनेवाले? आप शायद यह सिद्ध करना चाहते हैं कि प्रेमा की स्नेहमय सेवा ने मुझे मोटा कर दिया। यही सही, तो आपको क्यों जलन होती है, क्या अब भी आपका उससे कुछ नाता है। मैले बर्तन में साफ पानी भी मैला हो जाता है। द्वेष से भरा हृदय पवित्र आमोद भी नहीं सह सकता। यह वही दाननाथ है, जो दूसरों को चुटकियों में उड़ाया करते थे, अच्छे-अच्छों का काफिया तंग कर देते थे। आज सारी बुद्धि घास खाने चली गई थी। वह समझ रहे थे कि यह महाशय मुझे भुलावा दे कर प्रेमा की टोह लेना चाहते हैं। मुझी से उड़ने चले हैं। अभी कुछ दिन पढ़ो तब मेरे मुँह आना। बोले - 'तुम हँसे क्यों? क्या मैंने हँसी की बात कही है?'

दाननाथ - 'आपकी आँखों को धोखा हुआ है।'

दाननाथ - 'पहाड़ पर जाने में रुपए लगते हैं, यहाँ कौड़ी कफन को भी नहीं है।'

दाननाथ - 'तुम्हारे पास भी तो रुपए नहीं हैं, ईंट-पत्थर में उड़ा दिए।'


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होने को तैयार था। रंगरूप में अप्सरा थी, तुम उसके पैरों की धूल को भी नहीं पहुँच सकती। मुझे अब तक उसकी याद सताया करती है।'

बदरीप्रसाद - 'जरा प्रेमा को बुला लो, पूछ लेना ही अच्छा है।'

बदरीप्रसाद - 'रो-रो कर प्राण तो न दे देगी।'

बदरीप्रसाद - 'अच्छा, मैं ही एक बार उससे पूछूँगा। इन पढ़ी-लिखी लड़कियों का स्वभाव कुछ और हो जाता है। अगर उनके प्रेम और कर्तव्य में विरोध हो गया, तो उनका समस्त जीवन दुःखमय हो जाता है। वे प्रेम और कर्तव्य पर


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