दाननाथ - 'खूब उन रूपयों से आप पहाड़ों की हवा खाइएगा। अपने घर की जमा लुटा कर अब दूसरों के सामने हाथ फैलाते फिरोगे?'
दाननाथ - 'जी, तो मुझे क्षमा कीजिए, आप ही पहाड़ों की सैर कीजिए। तुमने व्यर्थ इतने रुपए नष्ट कर दिए। सौ-पचास अनाथों को तुमने आश्रय दे ही दिया, तो कौन बड़ा उपकार हुआ जाता है। हाँ, तुम्हारी लीडरी की अभिलाषा पूरी हो जाएगी।'
दाननाथ को 'उपकार' शब्द से घृणा थी। 'सेवा' को भी वह इतना ही घृणित समझते थे। उन्हें सेवा और उपकार के परदे में केवल अहंकार और ख्याति-प्रेम छिपा हुआ मालूम होता था। अमृतराय ने कुछ उत्तर न दिया। दाननाथ कोई उत्तर सुनने को तैयार भी न थे, उन्हें घर जाने की जल्दी थी, अतएव उन्होंने भी उठ कर हाथ बढ़ा दिया। दाननाथ ने हाथ मिलाया और विदा हो गए।
घर पहुँचे, तो प्रेमा ने पूछा - 'आज बड़ी देर लगाई, कहाँ चले गए थे? देर करके आना हो तो भोजन करके जाया करो।'
उत्सर्ग करना नहीं जानती या नहीं चाहती। हाँ, प्रेम और कर्तव्य में संयोग हो जाए, तो उनका जीवन आदर्श हो जाता है। ऐसा ही स्वभाव प्रेमा का भी जान पड़ता है। मैं दानू को लिखे देता हूँ कि मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रेमा से पूछ कर ही निश्चय कर सकूँगा।'
बदरीप्रसाद ने जरा माथा सिकोड़ कर पूछा - 'कमाने का ढंग कैसा, मैं नहीं समझा?'
बदरीप्रसाद - 'पचास ही हजार बनाए, तो क्या बनाए, मैं तो समझता हूँ, एक लाख से कम पर हाथ न मारेंगे।'
बदरीप्रसाद - 'जा कर कुछ दिनों उनकी शागिर्दी करो, इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।'