प्रेमा ने इसका कुछ उत्तर न दिया। हाँ में हाँ मिलाना न चाहती थी, विरोध करने का साहस न था। बोली - 'अच्छा चल कर भोजन तो कर लो, महाराजिन कल से भुनभुना रही है कि यहाँ बड़ी देर हो जाती है। कोई उसके घर का ताला तोड़ दे, तो कहीं की न रहे।'
दाननाथ दिल में अमृतराय को इतना नीच न समझते थे - कदापि नहीं। उन्होंने केवल प्रेमा को छेड़ने के लिए यह स्वाँग रचा था। प्रेमा बड़े असमंजस में पड़ गई। अमृतराय की यह निंदा उसके लिए असह्य थी। उनके प्रति अब भी उसके मन में श्रद्धा थी। दाननाथ के विचार इतने कुत्सित हैं, इसकी उसे कल्पना भी न थी। बड़े-बड़े तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देखकर बोली - 'मैं समझती हूँ कि तुम अमृतराय के साथ बड़ा अन्याय कर रहे हो। उनका हृदय विशुद्ध है, इसमें मुझे जरा भी संदेह नहीं। वह जो कुछ करना चाहते हैं, उससे समाज का उपकार होगा
बदरीप्रसाद - 'जरा भी नहीं। तुम कभी झूठ बोले ही नहीं, भला आज क्यों झूठ बोलने लगे। सत्य के अवतार तुम्हीं तो हो।'
कमलाप्रसाद - 'अच्छा, मैं ही झूठा सही, इसमें झगड़ा काहे का, थोड़े दिनों में आपकी कलई खुल जाएगी। आप जैसे सरल जीव संसार में न होते तो ऐसे धूर्तों की थैलियाँ कौन भरता?'
कमलाप्रसाद - 'यहाँ इन बातों से नहीं डरते। लगी-लिपटी बातें करना भाता ही नहीं। कहूँगा सत्य ही, चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा। वह हमारा अपमान करते हैं, तो हम उनकी