या नहीं, यह तो दूसरी बात है, लेकिन उनके विषय में ऐसे शब्द मुँह से निकाल कर तुम अपने हृदय का ओछापन दिखा रहे हो।'
बोले - 'मुझे नहीं मालूम था कि तुम अमृतराय को देवता समझ रही हो, हालाँकि देवता भी फिसलते देखे गए हैं।'
दाननाथ - 'तो फिर लीडर कैसे बनते, हम जैसों की श्रेणी में न आ जाते? अपने त्याग का सिक्का जनता पर कैसे बैठाते?'
इतने में वृद्ध माता आ कर खड़ी हो गईं। दाननाथ ने पूछा - 'क्या है, अम्माँ जी?'
दाननाथ ने हँस कर कहा - 'यही मुझसे लड़ रही है, अम्माँ जी, मैं तो बोलता भी नहीं।'
माता - 'बहू, जोर से तो तुम्हीं बोल रही हो। यह बेचारा तो बैठा हुआ है।'
दाननाथ - 'अम्माँ जी में यही तो गुण है कि वह सच ही बोलती हैं। तुम्हें शर्माना चाहिए।'
दाननाथ - 'तुमने भोजन क्यों न कर लिया? मैं तो दिन में दस बार खाता हूँ। मेरा
पूजा न करेंगे। आखिर वह हमारे कौन होते हैं, जो हम उनकी करतूतों पर परदा डालें? मैं तो उन्हें इतना बदनाम करूँगा कि वह शहर में किसी को मुँह न दिखा सकेंगे।'
बदरीप्रसाद ने विस्मित हो कर कहा - 'दाननाथ! वह भला क्यों अमृतराय पर आक्षेप करने लगा। उससे जैसे मैत्री है, वैसी तो मैंने और कहीं देखी नहीं।'
बदरीप्रसाद - 'कमलाप्रसाद कहते थे?'
बदरीप्रसाद - 'कमलाप्रसाद झूठ बोल रहा है, सरासर झूठ! दानू को मैं खूब जानता हूँ। उसका-सा सज्जन बहुत कम