इंतजार क्यों करती हो। आज बाबू अमृतराय ने भी कह दिया कि तुम इन दिनों मोटे हो गए हो। एकाध दिन न भी खाऊँ तो चिंता नहीं।'
दाननाथ - 'नहीं अम्माँ जी, सचमुच कहते थे।'
दाननाथ मोटे चाहे न हो गए हों, कुछ हरे अवश्य थे। चेहरे पर कुछ सुर्खी थी। देह भी कुछ चिकनी हो गई थी। मगर यह कहने की बात थी। माताओं को तो अपने लड़के सदैव ही दुबले मालूम होते हैं, लेकिन दाननाथ भी इस विषय में कुछ वहमी जीव थे। उन्हें हमेशा किसी-न-किसी बीमारी की शिकायत बनी रहती थी। कभी खाना नहीं हजम हुआ, खट्टी डकारें आ रही हैं, कभी सिर में चक्कर आ रहा है, कभी पैर का तलवा जल रहा है। इस तरह ये शिकायतें बढ़ गई थीं। कहीं बाहर जाते, तो उन्हें कोई शिकायत न होती, क्योंकि कोई सुनने वाला न होता। पहले अकेले माँ को सुनाते थे। अब एक और सुनने वाला मिल गया था। इस
मैंने देखा है। मुझे तो विश्वास है कि आज अमृतराय के हित के लिए प्राण देने का अवसर आ जाए, तो दानू शौक से प्राण दे देगा। आदमी क्या हीरा है। मुझसे जब मिलता है, बड़ी नम्रता से चरण छू लेता है।'
बदरीप्रसाद - 'अबकी डॉक्टर हो जाएगा।
पत्र का आशय क्या है, प्रेमा इसे तुरंत ताड़ गई। उसका हृदय जोर से धड़कने लगा। उसने काँपते हुए हाथों से पत्र ले लिया पर कैसा रहस्य! लिखावट तो साफ अमृतराय की है। उसकी आँखें भर आईं। लिखावट पर यह लिपि देख कर एक