दशा में यदि कोई उन्हें मोटा कहे, तो यह उसका अन्याय था। प्रेमा को भी उनकी खातिर करनी पड़ती थी। इस वक्त दाननाथ को खुश करने का उसे अच्छा अवसर मिल गया। बोली - 'उनकी आँखों में शनीचर है। दीदी बेचारी जरा मोटी थीं। रोज उन्हें ताना दिया करते, घी मत खाओ, दूध मत पीयो। परहेज करा-करा के बेचारी को मार डाला। मैं वहाँ होती तो लाला जी की खबर लेती।'
दाननाथ - 'अच्छी नहीं, पत्थर है। बलगम भरा हुआ है। महीने भर कसरत छोड़ दें, तो उठना-बैठना दूभर हो जाए।'
दाननाथ - 'मेरे साथ खेलते थे, तो रुला-रुला मारता था।'
लेकिन दाननाथ जहाँ विरोधी स्वभाव के मनुष्य थे, वहाँ कुछ दुराग्रही भी थे। जिस मनुष्य के पीछे उनका अपनी ही पत्नी के हाथों इतना घोर अपमान हुआ, उसे वह सस्ते नहीं छोड़ सकते। सारा संसार अमृतराय का यश गाता, उन्हें कोई परवाह न थी, नहीं
दिन उसका हृदय कितना फूल उठता था। पर आज! वही लिपि उसकी आँखों में काँटों की भाँति चुभने लगी। एक-एक अक्षर, बिच्छू की भाँति हृदय में डंक मारने लगा। उसने पत्र निकाल कर देखा - वही लिपि थी, वही चिर-परिचित सुंदर स्पष्ट लिपि, जो मानसिक शांति की द्योतक होती है। पत्र का आशय वही था, जो प्रेमा ने समझा था। वह इसके लिए पहले ही से तैयार थी। उसको निश्चय था कि दाननाथ इस अवसर पर न चूकेंगे। उसने इस पत्र का जवाब भी पहले ही से सोच रखा था, धन्यवाद