तो वह भी उस स्वर में अपना स्वर मिला सकते थे, वह भी करतल-ध्वनि कर सकते थे, पर उनकी पत्नी अमृतराय के प्रति इतनी श्रद्धा रखे और केवल हृदय में न रख कर उसकी दुहाई देती फिरे, जरा भी चिंता न करे कि इसका पति पर क्या प्रभाव होगा, यह स्थिति दुस्सह थी। अमृतराय अगर बोल सकते हैं, तो दाननाथ भी बोलने का अभ्यास करेंगे और अमृतराय का गर्व मर्दन कर देंगे, उसके साथ ही प्रेमा का भी। वह प्रेमा को दिखा देंगे कि जिन गुणों के लिए तू अमृतराय को पूज्य समझती है, वे गुण मुझमें भी हैं, और अधिक मात्रा में।
प्रेमा ने पूछा - 'क्या आज तुम्हारा व्याख्यान है? तुम तो पहले कभी नहीं बोले।'
प्रेमा - 'मुझे तो तुमने सुनाई ही नहीं। मैं भी जाऊँगी। देखूँ तुम कैसा बोलते हो?'
प्रेमा- 'लाला जी ने तुम्हें आखिर अपनी ओर घसीट ही लिया?'
प्रेमा ने दबी जबान से कहा - 'अब तक वह तुम्हें अपना सहायक समझते थे। यह नोटिस पढ़ कर चकित हो गए होंगे।'
के साथ साफ इनकार। पर यह पत्र अमृतराय की कलम से निकलेगा, इसकी संभावना ही उसकी कल्पना से बाहर थी। अमृतराय इतने हृदय-शून्य हैं, इसका उसे गुमान भी न हो सकता था। वही हृदय जो अमृतराय के साथ विपत्ति के कठोरतम आघात और बाधाओं की दुस्सह यातनाएँ सहन करने को तैयार था, इस अवहेलना की ठेस को न सह सका। वह अतुल प्रेम, वह असीम भक्ति जो प्रेमा ने उसमें बरसों से संचित कर रखी थी, एक दीर्घ शीतल विश्वास के रूप में निकल गई। उसे ऐसा जान