दाननाथ - 'नहीं, अभी मेरे सामने कर दो। तुम्हें गाते-बजाते मंदिर तक जाना पड़ेगा।'
रात के आठ बज रहे थे। दाननाथ प्रेमा के साथ बैठे दून की उड़ा रहे थे - 'सच कहता हूँ, प्रिये। दस हजार आदमी थे, मगर क्या मजाल कि किसी के खाँसने की आवाज भी आती हो। सब-के-सब बुत बने बैठे थे। तुम कहोगी, यह जीट उड़ा रहा है पर मैंने लोगों को कभी इतना तल्लीन नहीं देखा।'
दूँ।'
विवाह के बाद आज अमृतराय पहली बार दाननाथ के घर आए थे। प्रेमा तो ऐसी घबरा गई, मानो द्वार पर बारात आ गई हो। मुँह से आवाज ही न निकलती थी। भय होता था, कहीं अमृतराय उसकी आवाज न सुन लें। इशारे से महरी को बुलाया और पानदान मँगवा कर पान बनाने लगी।
अमृतराय ने उन्हें गले लगाते हुए कहा - 'आज तो यार तुमने कमाल कर दिखाया मैंने अपनी जिंदगी में कभी ऐसी स्पीच न सुनी थी।'
पड़ा मानो उसके संपूर्ण अंग शिथिल हो गए हैं, मानो हृदय भी निस्पंद हो गया है, मानो उसका अपनी वाणी पर लेशमात्र भी अधिकार नहीं है। उसके मुख, से ये शब्द निकल पड़े - 'आपकी जो इच्छा हो वह कीजिए, मुझे सब स्वीकार है। वह कहने जा रही थी - जब कुएँ में गिरना है, तो जैसे पक्का वैसे कच्चा, उसमें कोई भेद नहीं। पर जैसे किसी ने उसे सचेत कर दिया। वह तुरंत पत्र को वहीं फेंक कर अपने कमरे में लौट आई और खिड़की के सामने खड़ी हो कर फूट-फूट कर रोने लगी।'