अमृतराय - 'दिल्लगी नहीं थी भाई, जादू था। तुमने तो आग लगा दी। अब भला हम जैसों की कौन सुनेगा। मगर सच बताना यार, तुम्हें यह विभूति कैसे हाथ आ गई? मैं तो दाँत पीस रहा था। मौका होता वहीं तुम्हारी मरम्मत करता।'

अमृतराय- 'सबसे पीछे की तरफ, मैं मुँह छिपाए खड़ा था। आओ, जरा तुम्हारी पीठ ठोंक दूँ?'

अमृतराय - 'अब तुम मेरे हाथों पिटोगे। तुमने पहली ही स्पीच में अपनी धाक जमा दी, आगे चल कर तो तुम्हारा जवाब ही न मिलेगा। मुझे दुःख है तो यही कि हम और तुम अब दो प्रतिकूल मार्ग पर चलते नजर आएँगे। मगर यार यहाँ दूसरा कोई नहीं है, क्या तुम दिल से समझते हो कि सुधारों से हिंदू-समाज को हानि पहुँचेगी?'

अमृतराय - 'तो फिर हमारी और तुम्हारी खूब छनेगी, मगर एक बात का ध्यान रखना, हमारे सामाजिक सिद्धांतों में चाहे कितना ही भेद क्यों न हो, मंच


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संध्या हो गई थी। आकाश में एक-एक करके तारे निकलते आते थे। प्रेमा के हृदय में भी उसी प्रकार एक-एक करके स्मृतियाँ जागृत होने लगीं। देखते-देखते सारा गगन-मंडल तारों से जगमगा उठा। प्रेमा का हृदयाकाश भी स्मृतियों से आच्छन्न हो गया, पर इन असंख्य तारों से आकाश का अंधकार क्या और भी गहन नहीं हो गया था?


अध्याय 8

वैशाख में प्रेमा का विवाह दाननाथ के साथ हो गया। शादी बड़ी धूम-धाम से हुई। सारे शहर के रईसों को निमंत्रित किया। लाला बदरीप्रसाद ने दोनों हाथों


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