पर चाहे एक-दूसरे को नोच ही क्यों न खाएँ मगर मैत्री अक्षुण्ण रहनी चाहिए। हमारे निज के संबंध पर उनकी आँच तक न आने पाए। मुझे अपने ऊपर तो विश्वास है, लेकिन तुम्हारे ऊपर मुझे विश्वास नहीं है। क्षमा करना, मुझे भय है कि तुम...'

अमृतराय ने संदिग्ध भाव से कहा - 'तुम कहते हो, मगर मुझे विश्वास नहीं आता।'

अमृतराय - 'और तो घर में सब कुशल है न? अम्माँ जी से मेरा प्रणाम कह देना।'

अमृतराय - 'कई जगह जाना है। अनाथालय के लिए चंदे की अपील करनी है। जरा दस-पाँच आदमियों से मिल तो लूँ। भले आदमी, विरोध ही करना था, तो अनाथालय बन जाने के बाद करते। तुमने रास्ते में काँटे बिखेर दिए।'

प्रेमा - 'वह भी सुनने गए थे?'

प्रेमा - 'यह तुम कैसे कह सकते हो? पुराने पंडित चाहे सुधारों का विरोध करें, लेकिन शिक्षित-समाज तो नहीं कर सकता।'


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से रुपए लुटाए। मगर दाननाथ की ओर से कोई तैयारी न थी। अमृतराय चंदा करने के लिए बिहार की ओर चले थे और ताकीद कर गए थे कि धूम-धाम मत करना। दाननाथ उनकी इच्छा की अवहेलना कैसे करते।

पूर्णा के आने से कमलाप्रसाद और सुमित्रा एक-दूसरे से और पृथक हो गए। सुमित्रा के हृदय पर लदा हुआ बोझा उठ-सा गया। कहाँ तो वह दिन-ब-दिन विरक्तावस्था में खाट पर पड़ी रहती थी, कहाँ अब वह हरदम हँसती-बोलती रहती थी, कमलाप्रसाद की उसने परवाह ही करना


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