प्रेमा - 'अच्छा, उन्हें एक कौड़ी भी न मिलेगी। झगड़ा काहे का? अब रुपए लाओ, कल पूजा कर आऊँ। भाभी और पूर्णा दोनों को बुलाऊँगी। कुछ मुहल्ले की हैं। दस-बीस ब्राह्मणों का भोजन भी आवश्यक ही होगा।'
प्रेमा - 'राम जाने, तुम नीयत के बड़े खोटे हो, भैंस से चींटी वाली मसल करोगे क्या? शाम को सवा सेर कहा था, अब सवा पाव पर आ गए। मैंने सवा मन की मानता की है।'
कमलाप्रसाद ने घर में कदम रखा। प्रेमा ने जरा घूँघट आगे खींच लिया और सिर झुका कर खड़ी हो गई। कमलाप्रसाद ने प्रेमा की तरफ ताका भी नहीं, दाननाथ से बोले - 'भाई साहब, तुमने तो आज दुश्मनों की जबान बंद कर दी। सब-के-सब घबराए हुए हैं। आज मजा तो जब आए कि चंदे की अपील खाली जाए, कौड़ी न मिले।'
कमलाप्रसाद - 'कौन, अगर पाँच सौ से ज्यादा पा जाएँ तो मूँछ मुँड़ा लूँ, काशी में मुँह न दिखाऊँ।
छोड़ दी। वह कब घर में आता है, कब जाता है, कब खाता है, कब सोता है, उसकी उसे जरा भी फिक्र न रही। कमलाप्रसाद लंपट न था। सबकी यही धारणा थी कि उसमें चाहे और कितने ही दुर्गुण हों, पर यह ऐब न था। किसी स्त्री पर ताक-झाँक करते उसे किसी ने न देखा था। फिर पूर्णा के रूप ने उसे कैसे मोहित कर लिया, यह रहस्य कौन समझ सकता है। कदाचित पूर्णा की सरलता, दीनता और आश्रय-हीनता ने उसकी कुप्रवृत्ति को जगा दिया। उसकी कृपणता और कायरता ही उसके सदाचार